कितने प्रकार की समाधियाँ होती है? How many types of samādhis are there? (Only Hindi version)

Discussion from ‘BRVF – Very Last Chance’ group on WhatsApp –     [23/06 15:12] Umesh Sharma — Madhya Pradesh:   इस उच्चतम विचार समूह में केवल वेदांत के जिज्ञासू प्रेमियो का ही स्थान है। गुरुवार समाधि पाद के विषय में मार्ग दर्शित करें।।।। अनुग्रह होगा ।।सभी भक्तो पर??   ***   [23/06 15:14] भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वरा: […]

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संस्कृतवाङ्मय में प्रयुक्त कतिपय दृष्टान्तों का विश्लेषण – भाग २ / Analysis on the manifold analogies employed in the Sanskrit literature – Pt. 2

अन्तर्दीपिकान्यायः ।। antardīpikā-nyāyaḥ (Lamp & Indoor Position analogy)   दीपक एवं उसकी भीतरी (अन्तर्) अवस्थिति का दृष्टान्त । यह दृष्टान्त उस दृश्य पर आधारित है कि जहाँ एक दीपक को किसी स्थान के भीतर/बीचोबीच रखा जाये । इस दृष्टान्त का प्रयोग उस परिस्थिति में किया जाता है कि जहाँ किसी वस्तु के द्वारा अनेक प्रयोजन […]

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संस्कृतवाङ्मय में प्रयुक्त कतिपय दृष्टान्तों का विश्लेषण – भाग १ / Analysis on the manifold analogies employed in the Sanskrit literature – Pt. 1

अजाकृपाणीयन्याय: ।। aja-kṛpāṇīya-nyāyaḥ (Goat & Sword analogy)   बकरी एवं तलवार का दृष्टान्त । यह उस कथानक पर आधारित उदाहरण है कि जिसमें बकरी का आकस्मिक निधन हो जाता है खड्ग/तलवार के आघात से एवं इस दृष्टान्त का प्रयोग किसी ऐसी आश्चर्यजनक घटना के दिग्दर्शनार्थ किया जाता है जो कि यकायक बिना किसी पूर्व योजना […]

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क्या वेद एवं गीता केवल सनातनधर्मीयों के लिये है या इतर पन्थों के अनुगन्ताओ के लिये भी? / Are Vedas & Gītā only meant for the followers of Sanātana-dharma or are these relevant for the traversers of other paths, too? (Only Hindi version)

क्या वेद एवं गीता केवल सनातनधर्मीयों के लिये  है  या इतर पन्थों के अनुगन्ताओ के लिये भी? / Are Vedas & Gītā only meant for the followers of Sanātana-dharma or are these relevant for the traversers of other paths, too? (Only Hindi version)       कोई यदि गीता को ऐसा ग्रन्थ मानता है कि […]

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क्या श्रीमद्भागवतम् श्रीहरि के अतिरिक्त भी अन्य किसी देव/देवी को परात्पर ब्रह्म के रूप में स्वीकारता है? / Does Śrīmad-bhāgavatam establish any other celestial deity as the Absolute Reality other than Śrī Hari? (Only Hindi version)

क्या श्रीमद्भागवतम् श्रीहरि के अतिरिक्त भी अन्य किसी देव/देवी को परात्पर ब्रह्म के रूप में स्वीकारता है? / Does Śrīmad-bhāgavatam establish any other celestial deity as the Absolute Reality other than Śrī Hari? (Only Hindi version)       अवतारणा / Introduction –   आज के व्यावसायिक युग में कुछ श्रीमद्भागवत के महाप्रसिद्ध कथावाचकगण वैष्णवविरोधी […]

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One example of checking ideological deviance in so-called gurus / एक उदाहरण तथाकथित गुरुओं की वैचारिक भ्रान्ति के परीक्षणार्थ

The opinion of an ideologically deviant self-styled spiritual master/godman of Sanātana-dharma /  सनातनधर्म में एक भ्रान्तिपूर्ण विचार वाले स्वयम्भू गुरु का मत  –       A person solely endeavouring for his own emancipation from the clutches of nescience is deemed a selfish one in the spiritual context. Whereas, a one primarily endeavouring for the […]

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अध्यात्म का पहला नियम / Basic rule of spirituality

अध्यात्म का पहला नियम / Basic rule of spirituality —       महापुरुषों की प्रज्ञा भी शास्त्रानुगा ही होनी चाहिये, अन्यथा वे विमोहित ही माने जायेंगे । तब फिर साधारण लोक के पक्ष में तो शास्त्रानुगा बुद्धि होना अति अनिवार्य है । जिसकी शास्त्रानुगा बुद्धि नहीं, वही लोक व परमार्थ के विषय में सम्मोहित […]

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आर्यसमाजमतखण्डनम् – २  / आर्य समाज के मत का खण्डन  – २ / Confutation of the views of Ārya-samāja — Pt. II 

“आर्यसमाजीयों को यह भी समझ लेना चाहिये कि धर्म का तर्कसङ्गत होना आवश्यक नहीं, पर तर्क का धर्मसङ्गत होना आवश्यक है । वैसे ही धर्म को जड-विज्ञान सम्मत होना आवश्यक नहीं, परन्तु जड-विज्ञान को धर्म-सम्मत होना आवश्यक है! क्यों? क्योंकि यदि ऐसा नहीं स्वीकारा गया तब तो जड-विज्ञान के नियम भी कुछ ही काल के […]

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आर्यसमाजमतकपोलचपेटिका / आर्यसमाजीय मत रूपी गाल पर तमाचा / A big slap on the face of the Ārya-samājī doctrine.

वेद अवतारवाद के पोषक नहीं हैं – ऐसे आर्यसमाजी नवीन विद्रोही मत जो कि अब्राहमी विचारों से प्रभावित है उसका खण्डन / Vedas do not advocate the theory of incarnation of God – Refutation of such heretic view held by the new Āryasamājī sect influenced with Abrahamic notions. १/1) “उत नोऽहिर्बुध्न्य: शृणोत्वज एकपात्पृथिवी समुद्रः । […]

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Is ‘samanvaya’ or philosophical reconciliation between differing sects of Sanātana-dharma, actually, possible in an ultimate degree?

The samanvaya or philosophical reconciliation done by Advaitins or Radical Non-dualists, rather, dilutes the core tenets of those philosophical systems which Advaitins endeavour to reconcile. Philosophically, even the mutually varying doctrines of various Vaiṣṇava Sampradāyas differ to such an extent that the Viśiṣṭādvaita of Rāmānujācārya has been criticized by the Dvaita of Madhvācārya.   Though, […]

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