परमार्थस्य प्रारम्भः / अध्यात्म की शुरुआत / Beginning of spirituality

परमार्थस्य प्रारम्भः / अध्यात्म की शुरुआत / Beginning of spirituality       आचार्यानुग्रहेणैवानुभवं भगवत्कृपायाः भवति न तु स्वातन्त्र्येण – ‘प्रथमं तु गुरुं पूज्यं ततश्चैव ममार्च्चनम् / कुर्वन्सिद्धिमवाप्नोति ह्यन्यथा निष्फलं भवेत् //” — इति श्रीलसनातनगोस्वामिपादानां हरिभक्तिविलासे (४.३४४) समुद्धृतं स्मार्त्तं प्रमाणम् ।   आचार्यश्रीः गुरुपादाः   ***   आचार्य के अनुग्रह के द्वारा ही केवल भगवत्कृपा […]

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व्रजवासीयों की भक्ति व व्रजबहिर्भूत भक्तों की भक्ति का अन्तर / Difference between the devotion contained with the Vrajavāsī bhaktas and the devotees of other bhagavad-dhāmas (Only Hindi version)

व्रजवासीयों की भक्ति व व्रजबहिर्भूत भक्तों की भक्ति का अन्तर / Difference between the devotion contained with the Vrajavāsī bhaktas and the devotees of other bhagavad-dhāmas (Only Hindi version) “अर्जुन की सख्य-रति (भक्ति) भगवदैश्वर्य-ज्ञान के द्वारा प्रभावित थी, इसीलिये उसे ऐसा लगा कि उसने गलती कि है कृष्ण को अपना सखा, दास, सारथी, भाई इत्यादि […]

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प्राकृत-सहजिया व शुद्धभक्त / Imitation spiritualist vs. actual spiritualist

“हम गौडीय वैष्णव किसी व्यक्तिविशेष के अनुगामी नहीं, पर उसके विचार एवम् आचरण के अनुगामी होते है । यदि आचरण एवम् विचार षड्गोस्वामिपादों के सिद्धान्तों के व सनातन धर्म के पारम्परिक शिष्टाचार के विपरीत है, तो वह जो कोई भी हो, मान्य नही । पुरूष के शरीर में रहते हुए गोपीवेष को धारण करना – […]

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भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वराणाम् सन्देशोऽयम् चैतन्यपूर्णिमायाः होलिकादहनस्य वसन्तोत्सवस्य च निमित्ते / भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वर श्री का सन्देश चैतन्यपूर्णिमा + होलिकादहन + वसन्तोत्सव के उपलक्ष्य में /The message by Bhaktirasavedāntapīṭhādhīśvara Śrī on the occasion of Caitanya-pūrṇimā, Holikā-dahanam and Vasantotsava. (त्रिभाषीया आवृत्तिः / तीन भाषाओं में / triple linguistic version)

भक्तिरसवेदान्तपीठाधीश्वराणाम् सन्देशोऽयम् चैतन्यपूर्णिमायाः होलिकादहनस्य वसन्तोत्सवस्य च निमित्ते – सनातनधर्मरक्षायाः प्रधानतमो हेतुः तद्धर्मस्य सुदृढा दार्शनिकी भित्तिः एव । आद्यशङ्कराचार्या: वैदिकधर्मस्यापि तत्कालोचितरक्षणं दर्शनधारया कृतवन्तः। परवर्त्तिकालेऽप्यन्यसम्प्रदायानामाचार्या: अकाट्यया दार्शनिकतया वैदिकसिद्धान्तानां समयोचितम् रक्षणं प्रवर्द्धनम् परिष्कारं च कृतवन्तः। निष्कर्षेण विचारधाराया: अवलम्बनेन तैः सर्वै: आर्यधर्मो रक्षितः, न तु क्रियाविधिपरकानुष्ठानैः! नाऽपि राजनीतिकूटनित्यादीनां मुख्यालम्बनेन । कुमारिलभटट्मण्डनमिश्रप्रभाकरादिकर्मजडपूर्वमीमांसकै: अनुष्ठितेन वैदिकेन क्रियाविधिनापि सौगतार्हतादीनामवैदिकविचारसरण्या: आक्रमणकारिण्याः शैथिल्यं न अभवत् […]

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भगवान् सङ्कर्षण के पार्षद चित्रकेतु का वैष्णवापराध वास्तव में अपराध नहीं है तथा जय-विजय भगवत्पार्षदों ने स्वेच्छापूर्वक प्रतिकूल भाव को अङ्गीकृत किया है । / The offense rendered by Citraketu, the associate of Lord Saṅkarṣaṇa, unto Śiva is not an actual offense & the two eternal associates of Hari viz., Jaya & Vijaya have voluntarily undertaken an unfavourable disposition. (त्रिभाषीया आवृत्तिः / triple linguistic version)

भगवान् सङ्कर्षण के पार्षद चित्रकेतु का वैष्णवापराध वास्तव में अपराध नहीं है तथा जय-विजय भगवत्पार्षदों ने स्वेच्छापूर्वक प्रतिकूल भाव को अङ्गीकृत किया है       गौडीयवैष्णवसम्प्रदायाचार्य श्रील विश्वनाथ चक्रवर्तिपाद के द्वारा रचित ‘माधुर्य-कादम्बिनी’ ग्रन्थ (१७वीं शताब्दी – श्रीधाम वृन्दावन में प्रणीत) की तृतीयामृतवृष्टिः (तीसरे अध्याय) में से –   “यस्तु तत्रापि चित्रकेतौ कादाचित्को महदपराधः […]

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नयनोन्मीलनकारी सन्देश / A message opening the eyelids (Only Hindi version)

नयनोन्मिलनकारी सन्देश –       संतमत (किसी प्रसिद्ध सन्त ने जो कह दिया वही प्रमाण माना जाने लगा फिर चाहे वो कही गयी बात शास्त्रोपदिष्ट व पूर्वपरम्परागता हो या न हो ) व परम्परागत सम्प्रदाय (प्रस्थानत्रयी/चतुष्टयी के भाष्यों के आधार पर शताब्दीयों के दार्शनिक इतिहास के इम्तिहान को उत्तीर्ण कर किसी विशेष दार्शनिक मत […]

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जीव की अनादिबहिर्मुखावस्था व नित्यबद्धावस्था का पार्थक्य / Difference between the condition of beginningless aversion to God & conditioned stage of the jīvas. (Mostly Hindi version)

जीव की अनादिबहिर्मुखावस्था व नित्यबद्धावस्था का पार्थक्य       From BRVF’s WhatsApp group numbered 5 / भ.र.वे.प्र. किंकथं समूह क्रमाङ्क ५ से / भरवेप्रकिंकथंसमूहात् पञ्चमात् —   19/03 15:46] Pt. Satyanarayana / Deepak Sharma — Nayagaon Neemuch & Ujjain:   जय श्री मन्नारायण श्री आचार्य जी नमो नमः जिज्ञासा—-   जीव सदा से ही […]

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चैतन्यराद्धान्त में ब्रह्म के अद्वितीयत्त्व का अर्थघटन / The interpretation of the non-duality/singularity of Absolute/brahma in the Caitanyaite Vedānta (Mostly Hindi version)

चैतन्यराद्धान्त में ब्रह्म के अद्वितीयत्त्व का अर्थघटन / The interpretation of the non-duality/singularity of Absolute/brahma in the Caitanyaite Vedānta (Mostly Hindi version)       गौडीय वैष्णव वेदान्त दर्शन के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र तत्त्व सत्ता में है हर दृष्टिकोण से व हर धरातल पर। ‘एकमेवाद्वितीयम्ब्रह्म’ — उपनिषद् भी इसकी पुष्टि करता है । जीव, […]

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Vedantic lessons prepared till now (will be kept updated) / वेदान्त के पाठ अद्यावधि (अद्यतन रखा जायेगा)

Vedantic lessons perpared till now (will be kept updated)  / वेदान्त के पाठ अद्यावधि (अद्यतन रखा जायेगा)     Part zero here — https://goo.gl/q5QWeQ   Parts 1-5 here — https://goo.gl/b81NEQ   Question series on parts 0-5 — https://goo.gl/NfaMQo   6-17th parts — https://goo.gl/mFTmoN   Question series on parts 6-17th — https://goo.gl/AG9krt   18th-30th parts — […]

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क्या सद्गुरु की प्राप्ति करना अत्यावश्यक है या वैकल्पिक है – परब्रह्म (श्रीभगवान्) व शब्दब्रह्म (वेदादिशास्त्र) की समुपलब्धि व समधिगम के लिये? / Is the acceptance of a sadguru very much essential or optional – for the obtainment of God and the factual assimilation of the scriptural import? (Only Hindi version)

क्या सद्गुरु की प्राप्ति करना अत्यावश्यक है या वैकल्पिक है – परब्रह्म (श्रीभगवान्) व शब्दब्रह्म (वेदादिशास्त्र) की समुपलब्धि व समधिगम के लिये?     १) “यस्य देवे पराभक्ति: यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्था: प्रकाशन्ते महात्मनः।।“  — श्वेताश्वतर उपनिषद् ६.२३ । — अर्थात् जिसकी इष्टदेव में पराभक्ति (साध्या प्रेमभक्ति) है तथा वैसी ही […]

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