औपनिषदिक चतुःवाक्यों का प्रकृत अर्थ व शुकरहस्योपनिषद की उक्तियों का समाधान / Actual meaning of the quadruple assertions of Upaniṣads and clarification on Śukarahasyopaniṣad (Only Hindi version).

  १) ‘अहम्ब्रह्मास्मि’ (शुक्लयजुर्वेदीया बृहदारण्यकोपनिषद्)   नारायण श्रुति में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का व्याख्यान इस प्रकार से दिया गया है –   “अहं नामा हरिर्नित्यमहेयत्त्वात्प्रकीर्त्तितः । त्वञ्चासौ प्रतियोगित्त्वात्परोक्षत्त्वात्स इत्यपि ।। सर्वान्तर्यामिणि हरावस्मच्छब्दविभक्तयः । युष्मच्छब्दगताश्चैव सर्वास्तच्छब्दगा अपि ।। सर्वशब्दगताश्चैव वचनान्यखिलान्यपि । स्वतन्त्रत्त्वात्प्रवर्त्तन्ते व्यावृत्तेऽप्यखिलात्सदा ।। तत्सम्बन्धात्तु जीवेषु तत्सम्बन्धादचित्स्वपि । वर्तन्त उपचारेण तिङ्पदान्यखिलान्यपि । तस्मात् सर्वगतो विष्णुरेको भिच्च ततो […]

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आत्मपूजोपनिषद् आचार्य शङ्कर के केवलाद्वैत को पुष्ट नही करता है । / Ātmapūjopaniṣad does not entertain the Absolute Monism of Ācārya Śaṅkara. (Only Hindi version)

  आत्मपूजोपनिषद् आचार्य शङ्कर के केवलाद्वैत को पुष्ट नही करता है । / Ātmapūjopaniṣad does not entertain the Absolute Monism of Ācārya Śaṅkara. (Only Hindi version)     केवलाद्वैतीयों का मुख्य पूर्वपक्ष –   “सर्वनिरामयपरिपूर्णोऽहमस्मीति मुमुक्षूणां मोक्षैकसिद्धिर्भवति ।“   अनुवाद –   “समस्त आधिव्याधियों से रहित मैं पूर्ण ब्रह्म हूँ, ऐसा भाव रखने से ही […]

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अध्यात्मोपनिषद् ६९+७० आचार्य शङ्कर के केवलाद्वैत के समर्थक नही है । / Adhyātmopaniṣad 69+70 do no support Absolute Monism of Ācārya Śaṅkara.

अध्यात्मोपनिषद् ६९+७० आचार्य शङ्कर के केवलाद्वैत के समर्थक नही है । / Adhyātmopaniṣad 69+70 do no support Absolute Monism of Ācārya Śaṅkara.   पूर्वपक्ष –   शिष्य अध्यात्मोपनिषद् में ऐसा कह रहा है:   असङ्गोऽहमनङ्गोऽहमलिङ्गोऽहमहं हरिः । प्रशान्तोऽहमनन्तो परिपूर्णश्चिरन्तन: ।।६९।।…केवलोऽहं सदाशिवः।।   मैं सङ्गरहित हूँ, अङ्गरहित हूँ, चिह्नरहित और स्वयं हरि हूँ। मैं प्रशान्त हूँ, […]

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How institutionalized irrationally sentimental and blindly fanatic pseudo neo-Gauḍīyas manipulate the classical Gauḍīya Vaiṣṇava texts for fulfilling their petty motives! (All prophecies misused and misinterpreted by pseudo/neo-Gauḍīyas – vehemently refuted.)

How institutionalized irrationally sentimental and blindly fanatic pseudo neo-Gauḍīyas manipulate the classical Gauḍīya Vaiṣṇava texts for fulfilling their petty motives! (All prophecies misused and misinterpreted by pseudo/neo-Gauḍīyas – vehemently refuted.)         (1) Example – Misinterpreted and wrongly translated Caitanya-caritāmṛta 1.10.86 verse (ISKCON BBT’s edition) – “mālīra icchāya śākhā bahuta bāḍila / bāḍiyā paścima […]

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Further analysis on the indispensability of the knowledge of Vedānta-śāstra (English rendition of the original Hindi version)

Further analysis on the indispensability of the knowledge of Vedānta-śāstra (English rendition of the original Hindi version) —     1) If it were so easy to assimilate spiritual truth, the literature of Sanātana-dharma would not have expanded with the passage of time to a variety of complex philosophical scriptures containing the views and opinions […]

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भारतवर्ष की परिभाषा — भारत गणराज्य (खण्डित) के ६७वें गणतन्त्र दिवस समारोह के उपलक्ष्य में / Definition of Bhārata-varṣa — in celebration of the 67th Republic Day of (divided) India.

  “The official Sanskrit name for India is Bharat.” Bharat : meaning “Bha” means Light and Knowledge, “rata” means “Devoted”. Bharat means “devoted to light as against darkness”. The name “Bharat” was symbolic in nature revealing the fact that the whole country was highly enlightened spiritually. 2) The Vayu Purana says ‘he who conquers the […]

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भूमिका – वेदान्त में आये आपाततः जीवब्रह्माद्वैतपरक वाक्यों का समाधान / Intro. – Reconciliation of the Vedāntic assertions apparently substantiating Absolute Monism.

पूर्वपक्ष – “अत्रापि मया शैवेन “शिवोSहं शिवोSहम्” इत्येव उच्यते । ॐ नमः शिवाय । शिव एव शरणं मम । — मै शिव हु । मै शिव हु । ॐकार स्वरूप शिव को नमस्कार । शिव ही मेरे शरण है ।“ Prima Facie Contention – “I am Śiva. I am Śiva. Prostration unto Śiva who is […]

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शास्त्रपन्थानुगामी भक्तगण भगवत्तत्त्वज्ञान/वेदान्त/भक्तिरसदर्शन में क्यों निपुण बनने के इच्छुक बने रहते है? / Why the devotees treading on scriptural path remain desirous to be adept in the theology of Vedānta/bhakti-rasa-darśaanam? (In Hindi & English)

किसी भी पदार्थ वा व्यक्ति से (केवल ईश्वर से ही नहीं) प्रकृत स्नेह का लक्षण तभी सिद्ध होता है जब स्नेहशील/प्रेमी अपने प्रेमास्पद (जिससे नेहा हो रहा है वह) व्यक्ति के विषय में उत्तरोत्तर अधिक जिज्ञासु हो पड़ता है । यही सामान्य नियम भगवत्प्रेम के मार्ग पर भी लागू है । यदि भक्त श्रीभगवान् के […]

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आहारशुद्धि मोक्षपथ का प्रवेशद्वार (हिन्दी संस्करण)

आहारशुद्धि मोक्षपथ का प्रवेशद्वार—— १) मानव जैविक पदार्थ के भक्षण के ​बिना जीवित नहीं रह सकता। ‘होमो सेपियन’ अथवा मानव प्रजाति की शारिरिक संरचना ही इस प्रकार की है कि उसे अपने विकास व भरण—पोषण के लिए जैविक पदार्थ उपभोग की आवश्यकता है। इसमें कोई संदेह नहीं है। २) जीव—वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार शाकभक्षी स्तनपायीयों […]

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Even if God preaches in contravention with the eternal Vedic scriptures, His sermons are to be rejected.

  Sermons found within the mūla-śāstras like Vedas, Purāṇas, Upaniṣads etc. and the writings of the pūrvācāryas of the Sampradāya, if, are found actually (not just superficially or apparently) contradicted by any later writing of that Sampradāya in an irresolvable way, it is proven that such a later writing is unauthentic due to being inflicted […]

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